D&A Rule Part – IV
नियम–10 जांच रिपोर्ट पर कार्यवाही
यदि अनुशासनिक प्राधिकारी ने स्वयं जांच की है, तो वह अपने जांच निष्कर्षों पर, अथवा (यदि उसने स्वयं जांच नहीं की है) जांच अधिकारी की रिपोर्ट के सभी या किसी भी बिंदु पर निर्णय लेते हुए यह निश्चित करेगा कि उसके विचार से दी जाने वाली सजा उसके अधिकार क्षेत्र में है या नहीं।
यदि सजा उसके अधिकार क्षेत्र में है, तो वह अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्यवाही कर सकता है।
अथवा यदि न्याय के हित में किसी गवाह का और आगे परीक्षण आवश्यक हो, तो वह ऐसे गवाह को बुलाकर उसका परीक्षण, प्रतिपरीक्षण एवं पुनः परीक्षण कर सकता है और अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सजा दे सकता है।यदि अनुशासनिक प्राधिकारी के विचार से दी जाने वाली उपयुक्त सजा उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है, तो वह जांच कार्यवाही से संबंधित समस्त अभिलेख सक्षम अनुशासनिक प्राधिकारी को भेज देगा।
यदि अनुशासनिक प्राधिकारी स्वयं जांच अधिकारी नहीं है, तो वह, यदि ऐसा चाहे, कारणों का उल्लेख करते हुए, मामले को पुनः विचार एवं आगे की जांच हेतु जांच अधिकारी के पास भेज सकता है, जिस पर जांच अधिकारी नियम–9 के अनुसार “जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक” पुनः जांच करेगा।
यदि अनुशासनिक प्राधिकारी आरोप के किसी अनुच्छेद (Article) पर जांच अधिकारी के किसी निष्कर्ष से असहमत है, तो वह असहमति के कारणों का उल्लेख करते हुए उस अनुच्छेद पर अपना निर्णय लिखेगा, बशर्ते ऐसा करने के लिए अभिलेख पर पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हों।
यदि अनुशासनिक प्राधिकारी जांच अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर यह विचार करता है कि नियम–6 के खंड (i) से (iv) के अंतर्गत आने वाली कोई लघु सजा दी जानी चाहिए, तो वह नियम–11 के प्रावधानों पर ध्यान दिए बिना ऐसी सजा का आदेश पारित कर सकता है।
परंतु यह आवश्यक है कि जिन मामलों में संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श लेना आवश्यक हो, उन मामलों में जांच प्रक्रिया के समस्त कागजात आयोग को परामर्श हेतु भेजे जाएँ तथा कर्मचारी को दंड देने से पूर्व आयोग की सलाह पर विचार किया जाए।
यदि अनुशासनिक प्राधिकारी आरोप के प्रत्येक या किसी एक अनुच्छेद पर दिए गए जांच निष्कर्षों एवं जांच के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि नियम–6 के खंड (v) से (ix) के अंतर्गत आने वाला कोई प्रमुख दंड दिया जाना चाहिए, तो वह ऐसा कर सकता है और इसके लिए आरोपित रेलवे सेवक को प्रस्तावित सजा के संबंध में सूचना देना या प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा।
नोट
i. सेवा से बर्खास्तगी / पदच्युत के दंड के मामलों में अनुशासनिक प्राधिकारी को रेलवे सेवा (पेंशन) नियम, 1993 के नियम 65 के अंतर्गत अनुकंपा भत्ता, ग्रेच्युटी या अन्य लाभों के संबंध में भी आदेश पारित करना चाहिए।
(RBE 79/05, 164/08)
ii. निम्न वेतनमान में दिए गए दंड के प्रभावी होने से पूर्व यदि उच्च वेतनमान में पदोन्नति हो जाती है, तो दंड पदोन्नत पद पर भी उतनी ही अवधि के लिए लागू रहेगा, जितनी अवधि के लिए वह निम्न वेतनमान में दिया गया था।
(RBE 200/01)
iii. प्रमुख दंड की अनुशासनिक कार्यवाही को पूर्ण करने के लिए 150 दिनों की मॉडल समय–सीमा निर्धारित की गई है।
(Railway Board पत्र दिनांक 07.06.1995)
iv. सुरक्षा संबंधी अनुशासनिक मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया RBE 36/03 में दी गई है।
लघु दंडारोपण की प्रक्रिया
लघु दंडारोपण की कार्यवाही का क्रम निम्न प्रकार है—
आरोप पत्र जारी करना
दस्तावेजों का आरोपित कर्मचारी द्वारा निरीक्षण
आरोपित कर्मचारी द्वारा लिखित प्रतिवेदन प्रस्तुत करना
अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा लिखित प्रतिवेदन पर विचार कर—
(i) आरोप मुक्त करना, या
(ii) नियम–6 के अंतर्गत (i) से (iv) तक का दंड देना, या
(iii) नियम–9 के अंतर्गत प्रमुख दंड की जांच का आदेश देना, या
(iv) जांच प्रतिवेदन पर विचार कर दंड देना
लघु आरोप पत्र (Standard Form–11)
लघु दंडारोपण के लिए मानक प्रपत्र–11 का प्रयोग किया जाता है, जिसमें चार अनुच्छेद होते हैं।
यह एक प्रकार का “कारण बताओ नोटिस” होता है, जिसमें केवल निम्नलिखित का उल्लेख किया जाता है—
(क) आरोपों के आधार पर कार्यवाही का विचार
(ख) आरोपों की संक्षिप्त सूची
(ग) दस्तावेजों की सूची
नोट: इसमें गवाहों की सूची नहीं दी जाती तथा न तो दंडारोपण से पूर्व किसी गवाह की गवाही होती है और न ही उनसे जिरह।
आरोपित कर्मचारी को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करने हेतु 10 दिनों का समय दिया जाता है।
यदि इस अवधि में कोई प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो एकतरफा दंडारोपण किया जा सकता है।
दस्तावेजों का निरीक्षण
यद्यपि लघु दंड प्रक्रिया में दस्तावेजों के निरीक्षण की सुविधा अनिवार्य नहीं है, फिर भी आरोप पत्र के साथ दस्तावेजों की सूची संलग्न करना यह संकेत देता है कि मांग किए जाने पर निरीक्षण की सुविधा दी जानी चाहिए।
हालाँकि, आरोप पत्र में उल्लिखित न किए गए दस्तावेज उपलब्ध कराना या न कराना अनुशासनिक प्राधिकारी के विवेक पर निर्भर करेगा।
लिखित प्रतिवेदन एवं निर्णय
लघु आरोप पत्र की कार्यवाही संक्षिप्त होती है, अतः कर्मचारी को प्रत्येक आरोप के विरुद्ध अपना तर्कसंगत बचाव सावधानीपूर्वक प्रस्तुत करना चाहिए।
प्रतिवेदन प्राप्त होने पर अनुशासनिक प्राधिकारी के पास निम्न विकल्प होते हैं—
(i) यदि आरोपों का उचित खंडन हो गया हो, तो आरोप समाप्त कर कर्मचारी को सूचना देना (दो माह के भीतर)।
(ii) यदि आरोपों में पर्याप्त तथ्य हों, तो प्रत्येक आरोप पर कारण सहित दंडादेश पारित करना।
(iii) यदि न्याय के हित में आगे जांच आवश्यक हो, तो जांच कराने का आदेश देना।
नियम–12 आदेशों की सूचना
अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश, जिसमें प्रत्येक आरोप पर निष्कर्ष होंगे, रेलवे सेवक को सूचित किए जाएंगे।
यदि संघ लोक सेवा आयोग की सलाह ली गई हो, तो उसकी प्रति तथा यदि सलाह स्वीकार नहीं की गई हो, तो उसके कारणों का संक्षिप्त विवरण भी दिया जाएगा।
दंडादेश की सूचना प्रेषण की प्रक्रिया
जहाँ तक संभव हो, दंडादेश संबंधित रेलवे सेवक को हाथों–हाथ दिया जाएगा।
यदि कर्मचारी लेने से इंकार करता है, तो गवाहों की उपस्थिति में इसका उल्लेख किया जाएगा और आदेश उसी तिथि से लागू माना जाएगा।
यदि कर्मचारी कार्यालय में उपस्थित न हो, तो आदेश की प्रति उसके अंतिम ज्ञात पते पर पंजीकृत डाक से भेजी जाएगी।
यदि डाक “न मिला / लेने से इंकार” टिप्पणी के साथ लौट आए, तो आदेश की प्रति कार्यालय सूचना पट्ट पर तथा कर्मचारी के अंतिम ज्ञात निवास पर चस्पा की जाएगी।
ऐसे में आदेश, जारी किए जाने की तिथि से प्रभावी माना जाएगा।
नियम–13 सामूहिक जांच प्रक्रिया
जहाँ किसी मामले में दो या दो से अधिक रेलवे सेवक संबंधित हों, वहाँ राष्ट्रपति या सक्षम प्राधिकारी ऐसा आदेश पारित कर सकता है कि सभी संबंधित रेलवे सेवकों के विरुद्ध एक ही संयुक्त अनुशासनिक कार्यवाही की जाए।
सामूहिक जांच प्रक्रिया के लिए आवश्यक शर्तें
सभी आरोपित कर्मचारी रेलवे विभाग के ही होने चाहिए।
आरोपित कर्मचारियों की संख्या कम से कम दो होनी चाहिए।
सभी आरोपित कर्मचारियों पर एक ही आरोप होना चाहिए।
सभी कर्मचारी रेलवे सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1968 के अंतर्गत शासित होने चाहिए।
उदाहरणार्थ, इसमें रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के कर्मचारियों को शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि उनके लिए अलग अनुशासनिक नियम लागू होते हैं।
सामूहिक जांच कराने हेतु सक्षम प्राधिकारी
सामूहिक जांच प्रक्रिया संचालित करने के लिए वही प्राधिकारी आदेश जारी कर सकता है, जिसके पास सभी आरोपित कर्मचारियों को बर्खास्त करने की शक्ति हो।
यदि एक ही जांच कार्यवाही में विभिन्न वेतनमानों एवं पदों पर कार्यरत अनेक रेलवे कर्मचारी सम्मिलित हों, तो उनमें से सर्वोच्च प्राधिकारी ही सामूहिक जांच का आदेश दे सकता है।
यदि आरोपित कर्मचारी रेलवे के विभिन्न विभागों से संबंधित हों, तो उन सभी में से सर्वोच्च पदाधिकारी ही सामूहिक जांच का आदेश देगा।
परंतु ऐसा करते समय उसे संबंधित अन्य विभागाध्यक्षों से परामर्श लेना अनिवार्य होगानियम–14 विशेष परिस्थितियों में विशेष कार्यवाही की प्रक्रिया
रेलवे सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1968 का नियम 14 एक अत्यंत कठोर विशेष नियम है, जिसका प्रयोग अंतिम विकल्प के रूप में अत्यधिक असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है।
इस नियम का प्रयोग तभी किया जाता है, जब नियम 9, 11 अथवा 13 के अंतर्गत नियमित जांच युक्तिसंगत रूप से संभव न हो।रेलवे सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1968 का नियम 14, संविधान की धारा 311(2) के अनुरूप है, जिसके प्रावधान निम्नलिखित हैं —
नियम 14 के अंतर्गत स्थितियाँ
14(i)
जब रेलवे सेवक द्वारा ऐसा कोई कार्य किया गया हो, जिसके कारण उसे न्यायालय द्वारा दंडित किया गया हो;
अथवा14(ii)
जब अनुशासनिक प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट हो कि नियमों के अंतर्गत जांच कराना व्यवहारिक या युक्तिसंगत नहीं है;
अथवा14(iii)
जब राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हों कि राज्य की सुरक्षा के हित में इन नियमों के अंतर्गत जांच कराना उपयुक्त नहीं है,
तो अनुशासनिक प्राधिकारी मामले की परिस्थितियों पर विचार कर उचित आदेश पारित कर सकता है।नियम 14(i) का क्षेत्र (Scope)
नियम 14(i) तभी लागू किया जा सकता है जब —
किसी कर्मचारी को किसी आपराधिक मामले में सक्षम न्यायालय द्वारा सजा सुनाई गई हो, और
वह अपराध संबंधित रेलवे सेवा नियमों के अंतर्गत कदाचार (Misconduct) की परिभाषा में आता हो।
केवल आपराधिक मामले की संभावना के आधार पर, बिना मुकदमा चलाए अथवा बिना सजा सुनाए, यदि इस नियम का प्रयोग किया जाता है तो वह गैर-कानूनी होगा।
यदि किसी कर्मचारी को आजीवन कारावास की सजा दी गई हो, तब भी मामले के तथ्यों, तत्कालीन परिस्थितियों तथा रेलवे प्रशासन पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार करने के बाद ही आदेश पारित किया जाना चाहिए।
संभव है कि केवल अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा से ही न्याय की मांग पूरी हो जाए।नियम 14(i) के अंतर्गत दंड देने से पूर्व, आरोपित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस दिया जाना चाहिए तथा उसे अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
उसके पश्चात ही दंडादेश पारित किया जा सकता है।दंड के विरुद्ध कर्मचारी अपील अथवा पुनरीक्षण कर सकता है, परंतु यह नहीं कह सकता कि न्यायालय द्वारा दी गई सजा गलत थी, क्योंकि इससे न्यायालय की अवमानना होगी।
हालांकि वह यह अवश्य कह सकता है कि दी गई सजा अपराध की तुलना में अत्यधिक कठोर है।नियम 14(ii) के प्रयोग हेतु आवश्यक शर्तें
नियम 14(ii) के अंतर्गत कार्यवाही हेतु प्रमुख शर्तें —
यह कार्यवाही केवल नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी द्वारा ही की जा सकती है।
सक्षम प्राधिकारी की दृष्टि में नियमित जांच प्रक्रिया व्यवहारिक रूप से संभव न हो।
आदेश पारित करने से पूर्व उन कारणों का उल्लेख करना आवश्यक है, जिनके कारण नियमित जांच संभव नहीं है।
आदेश पर अनुशासनिक प्राधिकारी के स्वयं के हस्ताक्षर होने चाहिए, न कि “आदेश से”, “कृत से” या “की ओर से”, क्योंकि नियुक्ति का अधिकार प्रत्यायोज्य (Non-delegable) नहीं है।
यदि किन्हीं उल्लेखनीय कारणों से जांच कर पाना व्यवहारिक न हो, तो अनुशासनिक प्राधिकारी नियम 14(ii) के अंतर्गत रेलवे सेवक को सेवामुक्त, बर्खास्त या अनिवार्य सेवानिवृत्त कर सकता है।
यदि ऐसा दंडित व्यक्ति निर्धारित अवधि के भीतर अपील करता है, तो अपीलीय प्राधिकारी को मामले की पूर्ण जांच करनी होगी तथा कर्मचारी को व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) का अवसर देना होगा।
यदि उस समय भी जांच के लिए अनुकूल वातावरण न हो, तो कारणों का उल्लेख करते हुए जांच को स्थगित किया जा सकता है, किंतु जांच को सदैव के लिए असंभव नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के आधार पर दिशा-निर्देश
तुलसीराम पटेल एवं सत्यवीर सिंह प्रकरणों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों के अनुसार —
धारा 311(2) में निहित वैधानिक सुरक्षा को समाप्त नहीं किया गया है।
किसी भी सरकारी सेवक को बिना सूचना दिए तथा बिना पक्ष रखने का अवसर दिए, पदच्युत, पदावनत अथवा अनिवार्य सेवानिवृत्त नहीं किया जा सकता।यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल इस बात से संतुष्ट हों कि राज्य की सुरक्षा के हित में जांच संभव नहीं है, तो जांच प्रक्रिया समाप्त कर दी जाएगी और अनुशासनिक प्राधिकारी पदच्युत, पदावनत या अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा दे सकता है।
इस निर्णय के विरुद्ध अपील का अधिकार नहीं होगा, परंतु पुनरीक्षण के समय विस्तृत जांच की मांग की जा सकती है, बशर्ते परिस्थितियाँ उपयुक्त हों।
नियम 15 एवं 16 प्रतिनियुक्त रेलवे कर्मचारियों पर अनुशासनिक कार्यवाही
इन नियमों के अंतर्गत दो प्रकार के कर्मचारी आते हैं —
मूलतः रेलवे कर्मचारी, जिन्हें अन्य विभाग में प्रतिनियुक्त किया गया हो।
अन्य विभागों के कर्मचारी, जिन्हें रेलवे में प्रतिनियुक्त किया गया हो।
नियम 15
यदि रेलवे सेवक को किसी अन्य मंत्रालय / राज्य सरकार / स्थानीय निकाय के अधीन प्रतिनियुक्त किया गया है, तो उधार लेने वाले प्राधिकारी को निलंबन एवं अनुशासनिक जांच का अधिकार होगा।
नियम 16
यदि किसी बाहरी विभाग के कर्मचारी को रेलवे में प्रतिनियुक्त किया गया है, तो निलंबन अथवा जांच की सूचना उधार देने वाले प्राधिकारी को तत्काल दी जाएगी।
दंड का पदोन्नति एवं वरिष्ठता पर प्रभाव (संक्षेप)
निलंबित कर्मचारी को पदोन्नति नहीं दी जा सकती, भले ही उसका नाम पैनल में हो।
बड़ी सजा लंबित होने पर पदोन्नति नहीं होगी।
केवल छोटी सजा लंबित होने पर पदोन्नति पर विचार किया जा सकता है।
सजा की अवधि समाप्त होते ही वेतन एवं वेतनवृद्धि तत्काल बहाल की जाएगी।
